Wednesday, March 2, 2016

गौरांग महाप्रभु के समय में एक साधक था । उसको आंसू नहीं आते थे । उसको बड़ी फीलिंग हुआ करती थी कि सब आंसू बहा रहे हैं और मैं इतना अधम हूँ , इतना पतित हूँ । तो उसने अपना मिर्ची लिया और धोती के कपड़े में बांध करके उस मिर्ची को आँख से लगावे और उससे अपना पानी निकलेगा ही । तो किसी ने देख लिया कि रोज ये करता है कि हाँथ में लेकर के आँख में लगाता है और वो चीज पकड़ ली , देखा तो उसमें मिर्ची है , लाल मिर्चा । वो भाग करके महाप्रभु जी के पास गया कि महाराज जी देखिये इतना दम्भ हो रहा है आपके यहाँ । उन्होंने कहा , बुलाओ उसको । आया । पूंछा उससे , क्यों भाई तुम ऐसा क्यों करते हो ? हमने ये तो नहीं कहा कि तुम पाखण्ड करो इस प्रकार से मिर्ची लगा करके । उसने कहा महाराज जी मैं क्या करूं कई दिन से परेशान हूँ । मुझे नींद तक नहीं आती इस चिन्तन में , टेंशन में कि मुझे संकीर्तन में आँसू नहीं आते । तो इस प्रकार जब महाप्रभु जी से उसने कहा तो महाप्रभु जी ने दौड़कर उसको चिपटा लिया ।
अब शिकायत करने वाला दंग रह गया , कि सत्संग से इसको निकाल देना चाहिए इसके बजाय इसको चिपटा रहे हैं ! उन्होंने शिकायत करने वाले को डाँटा , एक बात बताओ जी तुम साधना करने आते हो , यहाँ कहते हैं राधाकृष्ण का ध्यान करो और तुम इस आदमी को देखते रहते हो कि ये पोटली लिये कैसे आँख में लगा रहा है ? क्या कर रहा है ? तुम इंस्पेक्शन करने आते हो यहाँ ? तुम बड़े अपराधी हो । ये बिलकुल अपराधी नहीं है , क्योंकि इसका लक्ष्य लोकरंजन का नहीं है । ये अपराधी तब होता जब लोकरंजन का लक्ष्य रखता अर्थात मिर्ची लगा करके आँसू बहा करके किसी को प्रभावित करके उससे कोई स्वार्थ सिद्धि चाहता , ये लक्ष्य बनाए होता अपना , तब तो ये दोषी था । ये तो अपने आप को दण्ड दे रहा है फील करके कि मेरे आँसू क्यों नहीं आते , और ये फीलिंग ऐसी है कि अगर थोड़े दिन भी ऐसी फीलिंग हो जायेगी तो ये फीलिंग ऐसी है कि अगर थोड़े दिन भी ऐसी फीलिंग हो जायेगी तो ये अपने लक्ष्य में सफल हो जायेगा ।
---- जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु जी महाराज।