Sunday, September 23, 2018

राधा–तत्त्व का वर्णन सर्वथा अनिर्वचनीय है।
शुक, सनकादिक जीवन्मुक्त अमलात्मा परमहंस निर्विकल्प समाधि में ध्यान - द्वारा जिस ज्योतिर्मय ब्रह्म की आराधना करते हैं, वह ब्रह्म श्री किशोरी जी के चरण–कमलों की नखमणि–चंद्रिका ही है अर्थात् किशोरी जी के चरणों की नख–मणि चंद्रिका को ही रसिक लोग निराकार ब्रह्म मानते हैं। उस निराकार ब्रह्म के बारे में ही वेदों का कथन है कि वह ब्रह्म अदृष्ट, अव्यवहार्य, अग्राह्य, अलक्षण एवं अचिन्त्य आदि हैं। फिर वह ब्रह्म भी गीता के अनुसार जिसमें प्रतिष्ठित है, वे ब्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण हैं । ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि वेदों के अनुसार वे श्रीकृष्ण भी राधिका की उपासना करते हैं । अतएव राधा–तत्त्व को जानने के चक्कर में न पड़कर तुम भी उनकी उपासना करो। वस्तुतस्तु श्री राधा, श्रीकृष्ण की ही आत्मा हैं । अतएव जीवात्माओं की भाँति परमात्मा भी अपनी आत्म–स्वरूपा श्री राधा की आराधना करता है।
( प्रेम रस मदिरा: श्रीराधा–माधुरी )
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज
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