Wednesday, February 8, 2017

हजारों साधनायें करते रहो,साधन कर-कर के अनंत जन्म बिता दो लेकिन भक्ति नहीं मिलेगी। भक्ति तो शरणागति से मिलती है,यानी साधनहीन भाव से मिलती है। साधन के बल को भुला दो। " साधनहीन दीन अपनावत"है वो।
नाथ सकल साधन ते हीना। भीतर से यह भाव बनाना होगा। करेक्ट,सेंट परसेंट।
------- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।