Saturday, September 1, 2012

बलि श्री गुरुदेव कृपाल की |
जिनके दिव्य वचन सुनि छूटत, ग्रंथि अविध्या-जाल की |
जिनके वरद-हस्त के सन्मुख, चल न चाल कलिकाल की |
जिनके बनत बिगारि सकत नहिं, मायाशक्ति गुपाल की |
जिनके युगल-चरन परसत मन, पावत रति नंदलाल की |
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लखत ‘कृपालु’ अनुग्रह गुरु के, लीला लाड़लि लाल की ||


भावार्थ- श्री कृपालु गुरुदेव पर बार-बार बलिहार जाता हूँ | उनके दिव्य उपदेशों को सुनकर अविध्या की गाँठ खुल जाती है | उनकी कृपा हो जाने पर कलिकाल का प्रभाव जाता रहता है | उनके दास बन जाने पर अतिशय प्रबल माया शक्ति बाल तक बाँका नहीं कर सकती | उनके युगल चरणों को भक्ति पूर्वक स्पर्श करने पर कृष्ण प्रेम प्राप्त होता है | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि श्री सद्गुरु की कृपा से मैं सदा श्यामा-श्याम की नयी-नयी लीलाओं का रस लेता हूँ |


(प्रेम रस मदिरा सद्गुरु - माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.